Kabir vani निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी –

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Bina Shish Ki Panihaari
Bina Shish Ki Panihaari

Nirgun Panth Ki Vani GuruVani

निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी

 

 हां धरन गगन जल अगन पवन इन पांचों का कौन माता कौन पिता

है कोई संता करो विचार सुरता करता उल्टा ज्ञान

 निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी हो वाणी जी

 

हां अजब सेर एक लंबा देखा वां रोपा पारस का खंबा

पांच मोहीले है पचरंगी सोलै सो मंडी 

बेठ सभा के बिच भेद बतला पाखंडी

है कोई संता करो विचार सुरता करता उल्टा ज्ञान

निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी हो वाणी जी ।।

 

हां अधर धार एक रचा बगीचा बिन पानी माली ने सिचा

उस बागो की क्या चतुराई तले फूल ऊपर है डंडी

 है कोई संता करो विचार सुरता करता उल्टा ज्ञान

निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी हो वाणी जी ।।

 

हां इस नगरी का राजा भारी नहीं पुरूष वो नई है नारी

ज्ञानी हो तो ज्ञान बता दो नहीं तो रख तो ताल तंदुरा 

है कोई संता करो विचार सुरता करता उल्टा ज्ञान

निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी हो वाणी जी ।।

 

हां अमर पेड़ बडला का कहिए वहां झुल रहा निर्गुण का लड़का

मुकुट भेद मुख से ना खोले क्यो बकता बेताल

हे कोई संता करो विचार सुरता करता उल्टा ज्ञान

निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी हो वाणी जी ।।

 

हां तुमको नहीं मालूम रुद्रासी जाई गुरु से करो तलाशी

शंकर हे जटोरी वाला कोई लागे चातुर के बाण

है कोई संता करो विचार सुरता करता उल्टा ज्ञान

निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी हो वाणी जी ।।

 

हां गोरख कबीर कि या है जकड़ी कोई पहूॅंचेगा माईका लाल 

 है कोई संता करो  विचार सुरता करता उल्टा ज्ञान

निर्गुण पंथ की वाणी गुरुवाणी हो वाणी जी ।।

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 kabir vani Nirguni Vani

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